ओरछा के महाराज मधुकर शाह और महारानी कुँवरि गणेश की कहानी - Hindi Kahaniyan हिंदी कहानियां 

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गुरुवार, 27 जून 2024

ओरछा के महाराज मधुकर शाह और महारानी कुँवरि गणेश की कहानी

ओरछा के महाराज मधुकर शाह और महारानी कुँवरि गणेश की कहानी 


ओरछा के महाराज मधुकर शाह (जिन्होंने ओरछा और टीकमगढ़ पर 1554 से 1592  तक शासन किया था) एक अन्नय कृष्णा भक्त थे, तथा उनकी पत्नी महारानी कुँवरि गणेश एक अन्नय राम भक्ता थी। एक दिन महाराज मधुकर शाह ने महारानी कुँवरि गणेश से भगवान कृष्ण के दर्शन करने के लिए वृंदावन चलने का आग्रह किया, महारानी राम भक्त थी, इसलिए उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया। इस बात पर महाराज मधुकर शाह नाराज हो गए और उन्होंने महारानी को ताना मारते हुए कहा, की यदि आप इतनी बड़ी राम भक्त हैं, तो अपने प्रभु राम को यहाँ ओरछा क्यों नहीं ले आती। महाराज की यह बात महारानी को चुभ गयी, यह सुन कर महारानी प्रण लेती है, की वे अयोध्या जायेगीं और भगवान श्री राम को प्रसन्न करके उन्हें अपने साथ ही ओरछा लेकर लौटेंगीं।

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इसके बाद महारानी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे अपनी कुटिया बनाई और भगवान श्री राम को प्रसन्न करने के लिए उनकी तपस्या आरम्भ की। महारानी ने कई महीनों तक सरयू नदी के किनारे घोर तपस्या की। कई महीनों की तपस्या के बाद भी जब भगवान श्री राम ने उनको दर्शन नहीं दिए, तो निराश होकर महारानी ने अपने प्राणों का अंत करने के लिए सरयू नदी में छलांग लगा दी। तभी एक अध्बुध चमत्कार हुआ, महारानी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री राम ने नदी के जल के भीतर ही महारानी कुँवरि गणेश को दर्शन दिए और उनकी जान भी बचाई। भगवान श्री राम ने महारानी से वरदान मांगने को कहा। 

महारानी ने भगवान श्री राम से कहा, हे प्रभु यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे साथ ओरछा चलने की कृपा करें। भगवान श्री राम ने महारानी की विनती पर ओरछा आना स्वीकार कर लिया और महारानी को अपनी सुन्दर  मूर्तियाँ प्रदान की, साथ ही भगवान श्री राम ने ओरछा चलने के लिए तीन शर्ते भी रखी। पहली शर्त यह थी की अयोध्या से ओरछा की यात्रा केवल पुष्य नक्षत्र में और पैदल ही की जाएगी, दूसरी शर्त थी की मूर्ति एक बार जहाँ रख दी जायगी वहां से फिर दुबारा नहीं हिलाई जा सकेगी, तीसरी और अंतिम शर्त थी की जहाँ भी मेरी मूर्ति स्थापना की जाएगी उस नगर में केवल मेरा ही राज रहेगा, उस जगह किसी अन्य राजा का राज नहीं चलेगा। महारानी कुँवरि गणेश ने भगवान श्री राम की तीनो शर्ते मान ली और उनसे ओरछा आने का निवेदन किया।

इसके बाद महारानी कुँवरि गणेश ने ओरछा में महाराज मधुकर शाह को संदेश भेजा, की वह भगवान श्री राम को लेकर ओरछा लौट रही हैं। यह सन्देश प्राप्त करने के बाद महाराज ने ओरछा में भगवान श्री राम की मूर्तियों की स्थापना करने के लिए एक भव्य चतुर्भुज मंदिर का निर्माण शुरू करवा दिया। महारानी कुँवरि गणेश ने भगवान श्री राम मूर्ति को लेकर हजारों संतो और स्त्रियों के साथ पुष्य नक्षत्र में यात्रा शुरू की। महारानी केवल पुष्य नक्षत्र के समय ही यात्रा करती थी, इसलिए अयोध्या से ओरछा तक की लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर की दुरी तय करने में महारानी को 8 माह और 27 दिन का समय लगा। राम राजा मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार महारानी कुँवरि गणेश 1575 में भगवान श्री राम की मूर्ति लेकर ओरछा पहुंची थी।

महारानी के ओरछा पहुंचने तक महाराजा मधुकर शाह द्वारा बनवाये जा रहे मंदिर का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका था, इसलिए महारानी ने भगवान श्री राम की मूर्ति को अपने महल की रसोई में विराजमान कर दिया, ताकि वह रोज अधिक से अधिक समय तक भगवन श्री राम के दर्शन कर सके। कुछ समय बाद महाराज मधुकर शाह द्वारा बनवाये जा रहे चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो गया। अब भगवान श्री राम की मूर्ति को नवनिर्मित चतुर्भुज  मंदिर में स्थापित किया जाना था, परन्तु जब भगवान श्री राम की मूर्ति को महल से मंदिर में स्थापित करने के लिए मूर्ति को उठाने का प्रयास किया गया, तो बहुत प्रयास करने के बाद भी मूर्ति को अपने स्थान से हिलाया नहीं जा सका। तब इसे भगवान श्री राम का चमत्कार मानते हुए, मूर्ति को उसी स्थान पर रहने दिया गया और राजमहल को ही मंदिर के रूप में बदल दिया गया।

जिस दिन ओरछा के महल में भगवान श्री राम की मूर्ति ने अपनी जगह से हिलने से इंकार कर दिया था, उसी दिन महाराजा मधुकर शाह ने अपने ओरछा के राज्य को भगवान श्री राम को सौंप दिया, और ओरछा के किले को छोड़ कर अपनी राजधानी टीकमगढ़ ले गए। उसी दिन से भगवान श्री राम ही ओरछा के राजा माने जाते हैं, और राम राजा सरकार कहलातें हैं, तथा ओरछा के महल को राम राजा मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के पास भव्य चतुर्भुज मंदिर भी बना हुआ है, जिसमें भगवान श्री राम की मूर्ति स्थापित होनी थी, परन्तु मूर्ति स्थापित ना होने के कारण यह भव्य मंदिर आज भी वीरान पड़ा है।

राम राजा मंदिर में भगवान श्री राम अपने पुरे दरबार के साथ विराजते है, यहां राम राजा के साथ देवी सीता, लक्ष्मण जी, हनुमान जी, जामवंत जी, सुग्रीव जी और अन्य मूर्तियाँ भी स्थित हैं। ओरछा में किसी भी काम की शुरुआत राम राजा से आज्ञा लेकर ही की जाती है। ओरछा में किसी शुभ कार्य और शादी के अवसर पर सबसे पहला निमंत्रण पत्र श्री राम राजा को ही दिया जाता है। यहां के सभी भक्त अपनी समस्या लेकर राम राजा के मंदिर ही जाते है, तथा भक्तो के अनुसार उन्हें सभी तरह के समाधान भी प्राप्त होते है। 

ओरछा के लोग सदियों से खुद को राजा राम की प्रजा मानते आयें हैं। ओरछा में कोई भी व्यक्ति राम राजा से बड़ा नहीं हो सकता, इसलिए ओरछा में राम राजा के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को गार्ड ऑफ़ ऑनर नहीं दिया जाता। यहां तक की ओरछा में राज्य के मुख्यमंत्री, भारत के प्रधानमंत्री और भारत के राष्ट्रपति के आने पर उन्हें भी गार्ड और ऑनर नहीं दिया जाता, क्योकि जनभावना के अनुसार ओरछा में केवल श्री राम राजा का ही राज चलता है, और उनके अलावा ओरछा में यह सम्मान किसी अन्य को प्राप्त नहीं है। इसलिए प्रशाशन के द्वारा भी इस परंपरा को बचाये रखने में हमेशा पूरा सहयोग किया जाता है।

श्री राम राजा मंदिर भारत में मध्यप्रदेश राज्य के निवाड़ी जिले के ओरछा नगर में स्थित है। यहां स्थित यह मंदिर रानी महल की रसोई के अंदर स्थापित है। इस मंदिर में भगवान श्री राम की ओरछा के राजा की तरह पूजा की जाती है, और राम राजा को मध्यप्रदेश पुलिस के द्वारा दिन में पांच बार (सुबह सूर्योदय से पहले, दिन में तीन बार आरती के समय और शाम को सूर्यास्त के बाद ) गार्ड ऑफ़ ऑर्नर दिया जाता है। ओरछा में भगवान श्री राम को गार्ड ऑफ़ ऑर्नर देने की यह परंपरा पिछले साढ़े चार सौ सालों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है की भगवान श्री राम दिन के समय ओरछा में रहते है, और रात के समय अयोध्या में जाकर विश्राम करते है।  



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