संत रविदास जी और गुरु गोरखनाथ जी की कहानी - Hindi Kahaniyan हिंदी कहानियां 

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मंगलवार, 18 जून 2024

संत रविदास जी और गुरु गोरखनाथ जी की कहानी

संत रविदास जी और गुरु गोरखनाथ जी की कहानी 


संत रविदास जी, संत कबीरदास जी, और गुरु गोरखनाथ तीनों समकालीन संत हुए। एक समय की बात है गुरु गोरखनाथ भ्रमण करते करते कबीरदास जी से मिलने उनकी कुटिया पर पहुंचे। गुरु गोरखनाथ जी अक्सर काशी प्रवास के दौरान कबीरदास जी से मिलने जाया करते थे। जब वे कबीरदास जी के घर पहुंचे, उस समय कबीरदास जी राम नाम का जप करते हुए भक्ति रस में डूबे थे, कबीरदास जी के साथ उनकी बेटी कमाली भी थी। गुरु गोरखनाथ जी भी कबीरदास जी के साथ बैठ कर भगवान का भजन करने लगे। 


कुछ देर बाद कबीरदास जी ने, गोरखनाथ जी से, अपने गुरु भाई संत रविदास जी के पास चलने का आग्रह किया। गोरखनाथ जी सहर्ष इसके लिए राजी हो गए। तभी कबीरदास जी की पुत्री कमाली बोली पिताजी मैं भी आपके साथ चलूंगी। कबीरदास जी बोले ठीक है बेटी तुम भी हमारे साथ चलो, इस प्रकार तीनों लोग चलते चलते संत रविदास जी की कुटिया पर पहुंचते हैं। 

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रविदास जी पेशे से चर्मकार थे, वे चमड़े से जुते बनाकर अपनी आजीविका चलाया करते थे। जब तीनों लोग रविदास जी की कुटिया पर पहुंचे उस समय रविदास जी भगवान का नाम जपते-जपते जुते बना रहे थे, कठौती से पानी लेकर चमड़े को नर्म करने के लिए भिगो रहे थे। गोरखनाथ जी और कबीरदास जी को कमाली के संग आया देखकर रविदास जी को बहुत प्रसन्नता हुई। रविदास जी ने बड़े प्रेम से सभी का स्वागत किया और उन्हें आसन पर बैठाया। इसके बाद रविदास जी सभी के लिए उसी कठौती में से पिने के लिए पानी लेकर आये।  


कबीरदास जी ने वह पानी पी लिया, परन्तु गोरखनाथ जी सोचने लगे यह कैसे भक्त हैं, घर पर आये हुए साधुओं को उसी कठौती का पानी पिलाते हैं, जिसमें से पानी लेकर चमड़ा भिगोया जाता है। ऐसा सोचकर गोरखनाथ जी ने वह पानी पिने से मना कर दिया, और बोले मुझे प्यास नहीं हैं, मैं पानी पीकर आया हूँ। इसके बाद वह पानी कबीरदास जी की पुत्री कमाली ने पी लिया। तीनों संत कुछ देर तक भगवद चर्चा करते रहे, कुछ देर बाद कबीरदास जी और उनकी बेटी कमाली अपने घर लौट गए और गुरु गोरखनाथ जी अपनी तीर्थयात्रा के पथ पर आगे बढ़ गए।  


कुछ वर्षो के बाद कबीरदास जी की पुत्री का विवाह मुल्तान में हो गया, मुल्तान उस समय अखंड भारत का हिस्सा था, जो आज के पाकिस्तान में स्थित है। एक दिन गुरु गोरखनाथ भ्रमण करते करते मुल्तान पहुंचे। मुल्तान के लोगों ने गुरु गोरखनाथ जी का ह्रदय से स्वागत किया और उनसे भोजन करने का आग्रह किया। गोरखनाथ जी बोले, जो कोई भी मेरे इस खप्पर को अन्न से भर देगा मैं उसी के घर भोजन करूँगा। 


नगर के लोग अपनी अपनी क्षमता के अनुसार गोरखनाथ जी के खप्पर को अन्न से भरने का प्रयास करने लगे, परन्तु गोरखनाथ जी का वह खप्पर चमत्कारिक खप्पर था। जो कुछ भी उस खप्पर में डाला जाता वह तुरंत गायब हो जाता। बड़े बड़े नगर सेठ भी उस खप्पर को भरने में असमर्थ रहे। सैकड़ो मण अनाज उस खप्पर में गिरकर गायब हो गया। 


जब कबीरदास जी की पुत्री कमाली को ज्ञात हुआ की उसके नगर में गुरु गोरखनाथ पधारे है, तो उसे बहुत ख़ुशी हुई। गोरखनाथ जी काशी प्रवास के दौरान अक्सर कबीरदास जी के घर आया करते थे, कमाली उन्हें काका कह कर बुलाती थी। कमाली ने अपने पति से आग्रह किया की वे गुरु गोरखनाथ जी को अपने घर भोजन करने के लिए आमंत्रित करें, वे मेरे काका हैं, मैं उन्हें अपने घर भोजन करना चाहती हूँ। 


कमाली का पति बोला, क्या तुम्हे ज्ञात नहीं, गोरखनाथ जी केवल उसी व्यक्ति के घर भोजन करेंगें, जो उनके खप्पर को अन्न से भर देगा, उन योगी के खप्पर को बड़े-बड़े सेठ नहीं भर पाए, तो मैं गरीब व्यक्ति कैसे उनका खप्पर भर सकता हूँ। कमाली के बहुत आग्रह करने पर उसके पति गोरखनाथ जी को भोजन के लिए आमंत्रित कर आये। 


अपने घर पर गुरु गोरखनाथ जी को आया देखकर कमाली ने बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया, गोरखनाथ जी ने अपने खप्पर को आगे बढ़ाया और बोले, बेटी पहले इस खप्पर को अन्न से भर दे, उसके बाद ही मैं तेरे घर भोजन करूँगा। कमाली घर के भीतर गयी और एक छोटा चम्मच भर चावल ले आयी और वे चावल उसने गोरखनाथ जी के खप्पर में डाल दिए। चावल डालते ही उनका खप्पर चावलों से भर गया और छलकने लगा। यह देखकर गुरु गोरखनाथ जी से साथ साथ वहाँ सभी उपस्थित लोग आश्चर्य करने लगे। 


गोरखनाथ जी ने कमाली से पूछा बेटी तुम कौन हो, और यह चमत्कार तुमने कैसे किया। कमाली बोली, काकाजी आपने मुझे पहचाना नहीं, मैं कबीरदास जी की पुत्री कमाली हूँ, यह मुल्तान मेरी ससुराल है, यहाँ मैं अपने पति के साथ रहती हूँ। आपको याद है, एक बार मै, पिताजी और आपके साथ रविदास जी की कुटिया पर गयी थी। वहाँ पर रविदास जी ने सभी को जल पिलाया था, आपने किसी कारण वश वह जल नहीं पिया था, परन्तु मैंने वह जल पी लिया था। उसी जल को पिने के बाद मुझे ज्ञान और भक्ति की प्राप्ति हुई, मैंने जो यह आपका खप्पर अन्न से भरा है, यह भी उसी जल का प्रताप है। आप यहाँ से भूखे लौट जाते यह मैं कैसे सहन कर सकती हूँ, इसलिए आपको भोजन करवाने के लिए ही मैंने आपका खप्पर भरा है। 


यह सब सुनकर गुरु गोरखनाथ आश्चर्यचकित रह गए। एक तरफ तो उन्हें कमाली से मिलकर अत्यंत ख़ुशी हो रही थी, तो दूसरी तरफ उन्हें उस दिन रविदास जी के हाथों से पानी न पिने का पछतावा हो रहा था। इसके बाद कमाली ने बड़े प्रेम से गुरु गोरखनाथ जी को अपने घर पर भोजन करवाया। भोजन करने के बाद गुरु गोरखनाथ जी ने कमाली और उसके परिवार को आशीर्वाद दिया और उसके घर से निकल पड़े। वहाँ से गोरखनाथ जी उसी क्षण योगबल से काशी में रविदास जी की कुटिया पर पहुंचे। 


रविदास जी की कुटिया पर पहुँचकर गोरखनाथ जी ने उनसे पिने को पानी माँगा। रविदास जी ने अपने भक्ति बल से जान लिया की गोरखनाथ जी मुल्तान में कमाली का चमत्कार देख कर आ रहें हैं, वे कुटिया से बहार आये और हाथ जोड़कर प्रणाम करके बोले "जब पानी पिलाया तब पिया नहीं, जिसने पिया वह जान गया, अब तो जोगी फिरे दिवाना, वह पानी मुल्तान गया"। यह सुनकर गुरु गोरखनाथ जी ने बड़े श्रद्धा भाव से रविदास जी को प्रणाम किया और अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए।  


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